रविवार, 27 नवंबर 2011

अनकही

एक दोपहर अलसायी सी
सब ओर सन्नाटा पसरा था
घर की बालकनी में खड़ी,
कुछ अनमनी सी मैं ।
सामने की दीवार पर बैठी,
गांव की एक अल्हड़ किशोरी
बाट जोहती सी,
एक किशोर मतवाला,
आकर लगा बतियाने
पकड़कर हाथ उसका
एक सिहरन दौड़ गई थी,
अन्दर मेरे
पहली बार महसूस किया था मैनें,
गहराई से,
तुम्हारे पास नहीं होने को,
और वह निगोड़ी चिरैया, उसने
एहसास कराया था मुझे,
तुम्हारे पास नहीं होने का, जब वो
चोंच लड़ा रही थी, अपने सखा से
फुदक-फुदक कर चँहक-चँहक कर,
लगा, कुछ रिस गया,
भीग गई थी मैं,
जब सामने के पेड़ की इक टहनी पर
दो फूल खिल रहे थे,
गले मिल रहे थे
दिल ने कहा था,
यही प्यार है शायद ...
आँखें भूल गई थीं सोना,
पलकें, बन्द होना,
कई रातें गवाह बनी थीं,
चाँद और चाँदनी की
आँख मिचौनी देखने की ।

मोहिनी चोरडिया

पुरुष और प्रकृति

जब उठाया घूंघट तुमने,
दिखाया मुखड़ा अपना
चाँद भी भरमाया
जब बिखरी तुम्हारे रूप की छटा
चाँदनी भी शरमायी
तुम्हारी चितवन पर
आवारा बादल ने सीटी बजाई ।
तुमने ली अगंड़ाई, अम्बर की बन आई
तुमसे मिलन की चाह में फैला दी बाहें,
क्षितिज तक उसने
भर लिया अंक में तुम्हें, प्रकृति, उसने
तुम्हारे गदराये बदन, मदमाते यौवन पर,
भँवरे की तरह
फिदा होकर, तुम्हारे रसीले होठों से
रसपान किया उसने ।
नारी ने तुमसे ही सीखा श्रृंगार, प्रकृति
पुरुष ने सीखी मनुहार
एक रिश्ता कायम हुआ फिर
‘समर्पण’ का
पुरुष की कठोरता और
नारी की मधुरता का
पुरुष की मनुहार और
नारी की लज्जा का
पुरुष और प्रकृति एकाकार हुए ।


मोहिनी चोरडिया

स्त्री और प्रकृति

प्रकृति और स्त्री
स्त्री और प्रकृति
कितना साम्य ?
दोनों में ही जीवन का प्रस्फुटन
दोनों ही जननी
नैसर्गिक वात्सल्यता का स्पंदन,
अन्तःस्तल की गहराइयों तक,
दोनों को रखता एक धरातल पर
दोनों ही करूणा की प्रतिमूर्ति
बिरले ही समझ पाते जिस भाषा को
दोनों ही सहनशीलता की पराकाष्ठा दिखातीं
प्रेम लुटातीं उन पर भी,
जो दे जाते आँसू इन्हें,
आहत कर जाते,
छलनी बना देते इनके मन को,
कुचल जाते, रौंद जाते इनके तन बदन को,
दुनियाँ की स्वार्थलिप्सा का शिकार
बनतीं बार-बार
लेकिन माफ़ कर जातीं हर बार
गफ़लत में जी रही दुनियाँ,
ये नहीं समझ पा रही
जब जागेंगीं,
दोनों, जननी और जन्मभूमि,
स्त्री और प्रकृति
दिखा देंगीं अपना रूप,
महिषासुर मर्दिनी का
करेंगी संहार असुरता का, क्रूरता का
करा देंगी साक्षात्कार
पीड़ा के उस दंश का, जो
मिलता रहा आजीवन इन्हें
अपनों से ही ।
मोहिनी चोरडिया

अस्तित्व की तलाश

मेरी मित्र ने एक दिन कहा
में" सेल्फ्मेड " हूँ
में असमंजस में पड़ी रही ,
सोचती रही ,
क्या ये सच है ?
भावो की धारा ने झकझोरा
एक नवजात शिशु की किलकारी ने
अनायास ही मेरा ध्यान बटोरा
इस शिशु को बनाने वाले बीज
कह रहे थे ,माते | हमें धारण करो
हमारा पोषण करो ,
हमें अपने रक्त से सींचो
तभी हम अपना अस्तित्व बनाये रख सकेंगे .
जैसे बीज बोने के बाद
धरती उसे धारण करती है
आकाश से पिता तुल्य सूर्य
अपनी ऊष्मा देते हैं ,उर्जा देते हैं
बदली अमृत तुल्य जल बरसाकर
अपना प्यार लुटाती है .
माली उसे सींचता है अपने दुलार से
धरती का कण -कण
या कहें पूरी कायनात
उस बीज की सुरक्षा में लग जाती है
उसका अस्तित्व बचाती है
और एक दिन बीज पेड़ बनता है ,
मधुर पेड़ ,जिसमें
सुंदर -सुंदर फूल खिलते हैं
प्रकृति की अभिव्यक्ति का
सबसे सुन्दर रूप
उस दिन देखने को मिलता है .
शिशु को भी एक पुरुष ,
योग्यतम पुरुष बनाने में ,
कई अनजान शक्तियां
अपनी ताकत लगा देती हैं
तब जाकर प्रकृति की
श्रेष्ठतम रचना सामने आती है
और यदि वह कहे की में "सेल्फमेड" हूँ तो
यह उसकी नादानी है,उसका अहंकार है
जो एक दिन उसे वापस
पहुंचा देगा वहीँ,उसी निचले धरातल पर
जहाँ उसका अस्तित्व
फिर-फिर अभिव्यक्ति की तलाश में होगा |
मोहिनी चोरडिया

बुधवार, 16 नवंबर 2011

सर्जनहार

किसी को फूल किसी को कांटे
तुमने ही शायद बांटे
उलझाते हो तो सुलझाते भी तुम्ही हो
गिराते हो तो उठाते भी तुम्ही हो
तुम्हारी ताकत को तोलना
मेरी सामर्थ्य में नहीं
हाँ ,मेरी ताकत को तोलने की
तुम पूरी कोशिश करते हो
मेरी हार में तुम हँसते हो
मेरी जीत में तुम हंसते हो
क्योंकि दोनों तुम्हारे हाथ में ही हैं
मैं कमज़ोर इंसान
हार में रोता
जीत में हंसता हूँ
बिना ये समझे कि
मेरी हार होती है तुम्हारे ही आदेश से,
जीत की खुशी क्या होती है
शायद ये समझाने के लिए |
मोहिनी चोरडिया

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पालनकर्ता

भोर
सोया जगता सा जीवन, बस
यही समय है
प्रार्थना करने का
आज के दिन की यात्रा
आरम्भ करने का |

यही समय है ,जब
हाथ उठें उसकी प्रशंसा में
उसके सम्मान में
जिसकी सारी कलाकृतियां
मन को लुभा लेती हैं|
आल्हादित कर जाती हैं|

चाहे दुधिया नीले पहाड़ों पर
उतरती सुनहरी धूप हो
या सुनहरी रुपहरी, मोतियाँ ,बैंजनी
बादलों से बना क्षितिज़
और उसकी ओट से झांकता
बस वह ही नज़र आता है
संसार का पालनकर्ता
सात घोड़ों के रथ पर सवार |

मुस्कुराते फूल हों और
उत्सव मनाते बगीचे
या गीत गाते खेत
प्रसन्नता से झूमती लहराती
गेहूं की बालियाँ हों
या इतराती नाचती तितलियाँ|

तारों की बरात हो
या धवल चाँदनी
अठखेलियां करती चन्दा से
मन को पुलक और आँखों को तृप्ति देते
हर जगह फैले हैं
उसके ही रंग |

कंहीं मंदिर के पट खुलते हैं
तो कंहीं घंटे ,घडियालों की कर्णप्रिय ध्वनि
दूर से आती चितपरिचित सी लगती है
लगता है सुन रही हूँ इन्हें जन्मों से
और सुनती रहूंगी आगे भी
जहाँ भी मैं रहूँ |

मोहिनी चोरडिया

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

वो बचपन


गली मोहल्ले के बच्चों की टोली के साथ
कंचे सतोलिये खेलता वो बचपन
भुलाए नहीं भूलता |

पड़ौस की सोलह घरों की ग्वाड़ी में
दादा बरगद के पेड़ से लटकती हवाई जड़ों से झूलना
भुलाए नहीं भूलता |
रात को माँ बहिनों के साथ चौपड खेलना
हँसते- हंसते पेट में बल पड़ना
भुलाए नहीं भूलता |
बर्फ के गोले बेचने वाले दादा का आवाज़ लगाना
लाल –गुलाबी शरबत डली चुस्कियां खाना
भुलाए नहीं भूलता |

मामा के घर के पास, बूढ़े कुम्हार काका के
चॉक पर चलते सुघड हाथों से बनी सुराही और घड़ा
भुलाए नहीं भूलता |
अमराई में जाकर कच्ची अमिया खाना
पत्थर मारकर इमली गिराना और मुहं में पानी आ जाना
भुलाए नहीं भूलता |

गर्मी की लू से बचाने के लिए
मामी का प्याज की गुरियाँ खिलाना
भुलाए नहीं भूलता |
कुओं पर बैलों की जोड़ियों से बंधी
रहंट की रस्सी पर बैठना, चढना, उतरना
पानी का कुँए से बाहर आना
भुलाए नहीं भूलता |

घर के बड़ों की शीतल छावं में
गर्मी की तपिश को भुलाता बचपन
बारिश के पानी में
कागज़ की कश्ती बहाता बचपन
न पहाड़ की ख्व्वाहिश
न वातानुकूलित कमरों की
ख्व्वाहिश थी तो बस मस्ती की
एक दूसरे के साथ रहने की
एक दूसरे के मन की बात सुनने की
एक दूसरे के मन की बात कहने की
जो आज कम मिलती दिखती है |

मोहिनी चोरडिया