रविवार, 11 सितंबर 2011
मुक्तक
हमने कुछ किया तो उसे
फ़र्ज बताया गया
फ़र्ज बताया गया
उन्होंनें कुछ किया तो उसे
क़र्ज बताया गया
क़र्ज बताया गया
आओ! विसंगतियां देखें जीवन की
अपनी सुविधानुसार हमें
शब्दों का अर्थ समझाया गया |
शब्दों का अर्थ समझाया गया |
पाकर खुशी मेरे आँसू निकल पड़े ,
उन्होंनें समझा मै दु:खी हूँ
मै अन्दर उदास,बाहर से हँस रही थी
उन्होंने समझा मै खुश हूँ ,
चीजें जैसी दिखती हैं वैसी होती नहीं
चीजें जैसी दिखती हैं वैसी होती नहीं
और कभी-कभी जैसी होती हैं
वैसी दिखतीं नहीं
तभी तो उन्होंनें, न मेरी हँसी के
पीछे छिपे दर्द को समझा
और न उस खुशी को ,
जो आंसुओं में बह रही थी
जो आंसुओं में बह रही थी
पानी में मीन पियासी
और भीड़ में भी
आदमी तन्हा हो सकता है
और भीड़ में भी
आदमी तन्हा हो सकता है
प्यार की बाँसुरी
तुम्हारे प्यार की फुहार से
इस कदर भीगा तन-मन, कि,
जीवन में फैले शुष्क रेगिस्तान की तपन
झुलसा न सकी इसे
आहत न कर सकी
दोपहर की चिलचिलाती धूप,
तुम्हारे प्यार को चुनर बना
ओढ़ जो लिया था मैंने
तुम्हारे नशीले गीतों को
कान्हा की बाँसुरी की तान समझ
पी गये थे मेरे कर्ण पुट
प्यार की उस झील के किनारे को
यमुना का कूल समझ
गोपी जो बन गई थी मैं |
मोहिनी चोरडिया
परमसत्ता
मौन निःशब्द रात्रि
चारों ओर सन्नाटा
नंगे पेड़ों पर गिरती बर्फ
रुई के फाहे सी
रात को और भी गंभीर बनाती
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
गरजते समुद्र की उफनती लहरें
प्रलय जैसा दृश्य दिखातीं
खौफनाक मंजर पैदा करतीं
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
गुलाबी भोर, स्याह रात्रि में विलीन होती
अपने अस्तित्व का विसर्जन करती दिखती
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
आज तक समझ नहीं पाया कोई,
तुम क्या करवाना चाहते हो किससे ?
दो लोगों के मिलने-बिछुड़ने
का रहस्य भी
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
अनजान लोगों को आपस में मिला देना
कब किसकी झोली भर देना,
कब किसी को खाली कर देना,
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
किसकी मदद से किसको क्या देना
गिरने पर नई दिशा बता देना
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
प्राची में उगता सूर्य और उसकी
निराली छटा में उड़ते पक्षी
बिना किसी आवाज़ के,
ऋतुओं का बदलना
कली का फूल बनना
सृजन की सारी प्रक्रियाएँ
तुम्हारे अस्तित्व का प्रमाण देती हैं |
उच्चतम जीवन जीने की कला सिखातीं
तुम्हारी सारी कृतियाँ
कितनी पुरातन फिर भी कितनी नूतन,
तुमको, तुम्हारे संकेतों को
हम साधारण मनुष्य
पढ़ ही नहीं पाते
और कभी पढ़ना नहीं चाहते
अपने ही अहंकार को साथ लिए
आगे बढ़ते रहते हैं
कुछ हाथ न आने पर
तुम्हारी ही ओर झांकते हैं
परमसत्ता को स्वीकारते हैं
शायद तुम्हारे ही आदेश से |
मोहिनी चोरडिया
मुक्तक
तुम करीब आये हो प्रियतम
मन बन गया मधुबन मेरा
तुमने प्रीत का रस उंडेला
खिल गया मन कमल मेरा |
मंजिल की बात करना
मुश्किल राहों के बगैर
ऐसे ही है जैसे सोचे कोई
एक गुलाब काँटों के बगैर |
फूलों का मुस्कुराना
काँटों के बल पर ही है
वे अक्सर बुरी नज़र का
शिकार हो जाते हैं ,
जिन गुलों की हिफाज़त
काँटे नहीं करते |
मोहिनी चोरडिया
वर्तमान
कहते हैं
बस दो दिन और
बस दो दिन और
लेकिन दो दिन और मिल जाते
तब भी उतना ही कर पाते
जितना अब तक किया है
ययाति की तरह
हम सब मौत से मोहलत
मांगते रहते हैं
और युग बीत जाने पर भी
उस मोहलत के रंग नहीं खिला पाते
रहते हैं वहीं ,चले थे जहां से
कोल्हू के बैल की तरह
ढोते हैं जिन्दगी
बिना आगे बढे
तब तक मौत वापस आ जाती है
वादा निभाने को कहती है ,और
हम लाचार से चल पड़ते हैं ,
उसके साथ ,खाली हाथ
रावण की तरह चाहते तो हैं ,लेकिन
न लगा पाते सीढियां स्वर्ग तक
वक्त जाया करते हैं ,
झूठे अहंकार में या कि प्रमाद में ,
बिना ये समझे कि
मौत का भी एक दिन है
दो दिन की जिन्दगी में
बचा हुआ एक ही दिन है
जो चाहें कर लें |
मोहिनी चोरडिया
तुम कहाँ हो?
पता नहीं,
शायद यहीं कहीं ,
नहीं- नहीं ,
यहीं
आसपास ही कहीं ,
क्योंकि ,
तुम्हारी सुगंध ,तुम्हारी सुवास ,
कलियों में चटकती है ,
फूलों में बसती है ,
हवाओं के संग घूमती है |
तुम्हारा अक्स ,तुम्हारी आकृति
कभी बादलों में
कभी पानी में ,
खेतों में , खलिहानों में
या की मुंडेर पर बैठे पक्षी के डेनों में
हर कहीं उतरी दिखती है |
तुम्हारी उपस्थिति
भोर की नीरवता में
सांझ के सुकून में
रात की शीतलता में
विश्राम करती महसूस होती है |
तुम्हारी ऊर्जा
हवा की सरसराहट में ,
पेड़ों की डोलती फुनगियों में
समन्दर की लहरों में
प्रेमी के पैरों में
घुंघरू बाँध नाचती दिखती है |
तुम्हारे होने का प्रमाण
जनमते बालक के रोने में ,
अर्थी के कोने में
मिल ही जाता है |
आस- पास ही नहीं
हर कहीं
तुम हो, तुम ही तो हो |
.
मोहिनी चोरड़िया
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